तहकीकात TODAY
रिपोर्ट – फरहान खान/ मोहम्मद सुमेर
इलाहाबाद। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि शरीयत के तहत अदालत के बाहर दिया गया तलाक, जैसे तलाक-ए-हसन, कानूनी रूप से वैध हो सकता है और इसके प्रभावी होने के लिए अदालत की पूर्व मंजूरी आवश्यक नहीं है। जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस सैयद कमर हसन रिजवी की खंडपीठ ने लखनऊ फैमिली कोर्ट के एक आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि यदि पति और पत्नी दोनों तलाक की प्रक्रिया और उसकी वैधता को स्वीकार करते हैं, तो फैमिली कोर्ट केवल इस आधार पर उन्हें तलाकशुदा घोषित करने से इनकार नहीं कर सकती कि तलाक अदालत के बाहर हुआ है। हाईकोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि ऐसे मामलों में, जहां तलाक को लेकर दोनों पक्षों के बीच कोई विवाद नहीं है, वहां फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 की धारा 7 के तहत फैमिली कोर्ट की भूमिका सीमित है। अदालत का दायित्व केवल यह सुनिश्चित करना है कि तलाक की प्रक्रिया कानून के अनुरूप पूरी हुई है तथा भविष्य में सरकारी अभिलेखों और अन्य कानूनी उद्देश्यों के लिए आवश्यक औपचारिक घोषणा (डिक्री) जारी करना है। पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि तलाक की वैधता को लेकर पति-पत्नी के बीच कोई विवाद नहीं है, तो फैमिली कोर्ट को केवल इस आधार पर राहत देने से इनकार नहीं करना चाहिए कि तलाक न्यायालय के बाहर संपन्न हुआ है। यह निर्णय मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत अदालत के बाहर होने वाले तलाक से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे उन दंपतियों को राहत मिलने की संभावना है, जिन्होंने शरीयत के अनुसार तलाक की प्रक्रिया पूरी कर ली है और बाद में सरकारी रिकॉर्ड या अन्य कानूनी औपचारिकताओं के लिए न्यायालय से डिक्री की आवश्यकता होती है। हालांकि, हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह निर्णय केवल उन मामलों पर लागू होगा, जहां तलाक की प्रक्रिया और उसकी वैधता को लेकर दोनों पक्षों के बीच कोई विवाद नहीं है। यदि किसी प्रकार का विवाद उत्पन्न होता है, तो उसका निर्णय संबंधित अदालत तथ्यों और कानून के आधार पर करेगी।





