तहकीकात TODAY
रिपोर्ट – फरहान खान/ जाहिद सलमानी
मुंबई। सिद्धिविनायक गणपति मंदिर के दान संग्रह में कथित अनियमितताओं को लेकर महाराष्ट्र में राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर बहस तेज हो गई है। मंदिर में दान की रकम के प्रबंधन और कथित वित्तीय गड़बड़ियों को लेकर उठे सवालों के बीच मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने वर्ष 2022 से 2026 तक के वित्तीय रिकॉर्ड की जांच के निर्देश दिए हैं। मामले में मंदिर के नौ कर्मचारियों की गिरफ्तारी की जानकारी भी सामने आई है। मामले को लेकर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) प्रमुख राज ठाकरे ने 2 अगस्त को प्रेस कॉन्फ्रेंस में गंभीर आरोप लगाए। उनके अनुसार, वर्ष 2023 से मंदिर के दान में हर साल करीब 18 करोड़ रुपये की कथित अनियमितताएं सामने आई हैं। हालांकि, इन आरोपों की अंतिम पुष्टि जांच के निष्कर्षों के बाद ही हो सकेगी। राज ठाकरे ने दान राशि में कथित अंतर का उदाहरण देते हुए दावा किया कि आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद मंदिर में साप्ताहिक दान करीब 50 लाख रुपये से बढ़कर 1.5 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इस दावे ने मंदिर की दान संग्रह और लेखा व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले में अब तक नौ मंदिर कर्मचारियों की गिरफ्तारी बताई गई है। इसके बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या कथित वित्तीय अनियमितता केवल कर्मचारियों के स्तर तक सीमित थी या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा था। जांच एजेंसियों के सामने अब यह स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा कि दान राशि की गिनती, रिकॉर्ड तैयार करने, बैंक में जमा कराने और उसके लेखांकन की पूरी प्रक्रिया में कहीं गड़बड़ी हुई या नहीं। साथ ही यह भी पता लगाना होगा कि कथित अनियमितताओं से किसी अन्य व्यक्ति या संस्था को आर्थिक लाभ पहुंचा या नहीं। ऐसे मामलों में सामान्य ऑडिट के साथ-साथ फोरेंसिक ऑडिट भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके जरिए दान पेटियों से प्राप्त रकम, कैश काउंटिंग रिकॉर्ड, रजिस्टर, बैंक में जमा राशि, सीसीटीवी फुटेज और संबंधित वित्तीय लेन-देन का मिलान किया जा सकता है। जांच में यह भी देखा जा सकता है कि मंदिर में प्रतिदिन प्राप्त दान और बैंक में जमा रकम के बीच कोई अंतर तो नहीं रहा। यदि किसी अवधि में रकम में असामान्य अंतर मिलता है तो संबंधित कर्मचारियों और अधिकारियों की भूमिका की जांच की जा सकती है। मामले ने बड़े धार्मिक संस्थानों में दान राशि के प्रबंधन और पारदर्शिता को लेकर भी बहस छेड़ दी है। विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के स्तर पर ऐसी व्यवस्थाओं की मांग उठती रही है, जिनमें दान की रकम का रिकॉर्ड अधिक पारदर्शी हो और श्रद्धालुओं को यह जानकारी मिल सके कि मंदिर में प्राप्त धन का इस्तेमाल किस प्रकार किया जा रहा है। दान संग्रह केंद्रों पर CCTV निगरानी, डिजिटल रिकॉर्डिंग, नियमित स्वतंत्र ऑडिट और ऑनलाइन वित्तीय जानकारी जैसी व्यवस्थाएं लागू करने से पारदर्शिता बढ़ाई जा सकती है। सिद्धिविनायक दान मामले में फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात जांच का निष्पक्ष और विस्तृत तरीके से पूरा होना है। कथित 18 करोड़ रुपये की अनियमितता, साप्ताहिक दान में बताए गए अंतर और गिरफ्तार कर्मचारियों की भूमिका समेत सभी आरोपों की पुष्टि जांच और उपलब्ध वित्तीय साक्ष्यों के आधार पर ही हो सकेगी। श्रद्धालुओं का दान धार्मिक आस्था से जुड़ा होता है। ऐसे में जांच एजेंसियों के सामने न केवल कथित वित्तीय गड़बड़ी की सच्चाई सामने लाने की चुनौती है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि आस्था के नाम पर जमा होने वाली रकम का इस्तेमाल पूरी पारदर्शिता और निर्धारित उद्देश्यों के अनुरूप हो।





