जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर अदालत सख्त

City/ STATE'S नई दिल्ली प्रदर्शन

तहकीकात TODAY 

रिपोर्ट – फरहान खान/ मोनिस उद्दीन 

नई दिल्ली। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध और अपनी आवाज सत्ता तक पहुंचाना नागरिकों का महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार है। लेकिन राजधानी दिल्ली में प्रदर्शन के लिए स्थान को लेकर चल रही कानूनी और प्रशासनिक बहस ने इस अधिकार की पहुंच पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने और रामलीला मैदान को प्रमुख प्रदर्शन स्थल बनाने के मुद्दे पर अदालतों की टिप्पणियों के बाद यह बहस और तेज हो गई है। 7 अगस्त को दिल्ली हाईकोर्ट में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति से जुड़ी याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अमित महाजन ने कहा कि प्रदर्शनों के कारण दिल्ली को अनावश्यक रूप से बंधक नहीं बनाया जा सकता। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र सरकार से जंतर-मंतर को निर्दिष्ट प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने और रामलीला मैदान को मुख्य प्रदर्शन स्थल बनाने संबंधी याचिका पर विचार करने को कहा है। सतही तौर पर देखें तो प्रदर्शन स्थल बदलने के पीछे ट्रैफिक, सुरक्षा, वीआईपी आवाजाही और स्थानीय निवासियों की परेशानी जैसे कारण बताए जाते हैं। लेकिन इस बदलाव का आर्थिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए शुल्क नहीं लिया जाता, जबकि रामलीला मैदान में बड़े प्रदर्शन या सभा के लिए करीब 50 हजार रुपये प्रतिदिन का खर्च सामने आता है। ऐसे में सवाल उठता है कि पेंशन, रोजगार, वेतन, किसान या सामाजिक अधिकारों जैसे मुद्दों को लेकर दिल्ली पहुंचने वाले छोटे संगठन क्या इतना खर्च वहन कर पाएंगे? जंतर-मंतर लंबे समय से विभिन्न सामाजिक, कर्मचारी, किसान और छात्र संगठनों के विरोध का प्रमुख केंद्र रहा है। अन्ना आंदोलन और निर्भया कांड के बाद हुए प्रदर्शनों सहित कई बड़े जन आंदोलनों ने इसी स्थान से अपनी आवाज देश के नीति-निर्माताओं तक पहुंचाई। यदि प्रदर्शन के लिए ऐसे स्थान को प्राथमिकता दी जाती है जहां भारी शुल्क देना पड़े, तो छोटे और आर्थिक रूप से कमजोर संगठनों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है। इससे यह बहस भी जन्म लेती है कि क्या शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार आर्थिक क्षमता पर निर्भर होना चाहिए। दिल्ली में प्रदर्शन स्थलों को लेकर लंबे समय से व्यवस्था और प्रदर्शनकारियों के बीच खींचतान रही है। पहले राजपथ स्थित बोट क्लब विरोध प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र था। बाद में सुरक्षा और प्रशासनिक कारणों से प्रदर्शनों को जंतर-मंतर तथा अन्य निर्धारित स्थानों तक सीमित किया गया।

2003 में दिल्ली पुलिस के स्थायी आदेश के तहत अलग-अलग संख्या के प्रदर्शनकारियों के लिए अलग-अलग स्थान निर्धारित किए गए थे। जंतर-मंतर पर अपेक्षाकृत छोटी भीड़ और रामलीला मैदान में बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों के जुटने की व्यवस्था की गई थी। 2017 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने ध्वनि प्रदूषण और क्षेत्र के मास्टर प्लान में आवासीय क्षेत्र होने का हवाला देते हुए जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों पर रोक लगाई थी। बाद में जुलाई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध को हटाते हुए प्रदर्शनकारियों और स्थानीय निवासियों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाने की जरूरत बताई। इसके बाद दिल्ली पुलिस की व्यवस्था में जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों की संख्या को सीमित किया गया और बड़ी भीड़ के लिए रामलीला मैदान को विकल्प बनाया गया। जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने की संभावना को लेकर सामाजिक संगठनों और प्रदर्शनकारियों के बीच चिंता बढ़ सकती है। उनका तर्क है कि प्रदर्शन केवल भीड़ जुटाने का माध्यम नहीं, बल्कि सरकार तक अपनी बात पहुंचाने का लोकतांत्रिक जरिया है। वहीं प्रशासन के सामने सुरक्षा, यातायात और आम नागरिकों की सुविधा बनाए रखने की चुनौती भी है। ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि दोनों पक्षों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाया जाए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यदि रामलीला मैदान को प्रमुख प्रदर्शन स्थल बनाया जाता है तो छोटे संगठनों, किसान यूनियनों, छात्रों और सामाजिक समूहों के लिए इसे मुफ्त या नाममात्र शुल्क पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है। साथ ही राजधानी में संसद और प्रमुख सरकारी संस्थानों के आसपास शांतिपूर्ण प्रदर्शन के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और समान नियम बनाए जाने की जरूरत है, ताकि प्रशासनिक अनुमति व्यवस्था किसी नागरिक के विरोध के अधिकार को मनमाने तरीके से प्रभावित न कर सके। विरोध की आवाज दबाने के बजाय व्यवस्था का रास्ता खोजने की जरूरत जंतर-मंतर केवल दिल्ली की एक सड़क या प्रदर्शन स्थल नहीं है। यह लंबे समय से उन लोगों के लिए आवाज उठाने का माध्यम रहा है, जो अपनी समस्याएं सत्ता के केंद्र तक पहुंचाना चाहते हैं। सुरक्षा और यातायात व्यवस्था जरूरी है, लेकिन इसके साथ यह भी सुनिश्चित करना होगा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण असहमति के लिए जगह बनी रहे। चुनौती यही है कि शहर भी चले और नागरिक की आवाज भी सुनी जाए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *