‘वस्तुत्व महाकाव्य’ पर राष्ट्रीय जैन विद्वत संगोष्ठी, साहित्य और संस्कृति से राष्ट्र निर्माण का दिया संदेश

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तहकीकात TODAY 

रिपोर्ट – फरहान खान/ इस्तिकार खान

आगरा। छीपीटोला स्थित निर्मल सेवा सदन में संत शिरोमणि पट्टाचार्य आचार्य भगवन श्री 108 विशुद्ध सागर महामुनिराज के परम प्रभावक शिष्य श्रमण मुनि श्री 108 समत्व सागर महाराज, श्रमण मुनि श्री 108 शील सागर महाराज एवं श्रमण मुनि श्री 108 सुप्रभात सागर महाराज ससंघ के सानिध्य में राष्ट्रीय जैन विद्वत संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का आयोजन छीपीटोला वर्षायोग समिति के तत्वावधान में किया गया। संगोष्ठी में आचार्य विशुद्ध सागर महाराज द्वारा रचित ‘वस्तुत्व महाकाव्य’ विषय पर देश के शीर्ष जैन विद्वानों ने अपने विचार रखे। संगोष्ठी में बड़ी संख्या में धर्मावलंबियों ने भाग लेकर धार्मिक एवं ज्ञानवर्धक कार्यक्रम का लाभ प्राप्त किया।

मुनि श्री 108 समत्व सागर महाराज ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि वही संस्कृति अपना अस्तित्व सुरक्षित रख सकती है, जिसके पास श्रेष्ठ साहित्य और श्रेष्ठ पुरातत्व संपदा होती है। उन्होंने कहा कि भारत आज विश्व के आकर्षण का केंद्र है तो इसके पीछे भारत की समृद्ध पुरातात्विक और साहित्यिक विरासत प्रमुख कारण है। विश्व के अनेक विश्वविद्यालय आज भारत की संस्कृति और इतिहास को समझने के लिए पुनः भारत की ओर देख रहे हैं। उन्होंने कहा कि पुरातत्व संपदा को देखने के लिए लोग भारत आ सकते हैं, लेकिन भारतीय संस्कृति को समझने के लिए उसके साहित्य को समझना आवश्यक है। साहित्य ऐसा माध्यम है, जो अतीत का दर्पण दिखाने के साथ वर्तमान को स्पष्ट करता है और भविष्य की दिशा भी बताता है।

मुनि श्री ने राष्ट्र निर्माण में साहित्य की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत का इतिहास केवल शिलालेखों में ही नहीं, बल्कि पूर्वकाल में आचार्यों द्वारा लिखी गई हस्तलिखित प्रतियों और ताड़पत्रों में भी सुरक्षित है। इसलिए साहित्य का सृजन करते समय केवल वर्तमान और वर्तमान की भाषा तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्होंने नवीन विद्वानों का आह्वान करते हुए कहा कि उनकी कृति ऐसी होनी चाहिए, जिसे पाठक एक बार पढ़कर रख न दे, बल्कि उसमें सिद्धांत, विषय-वस्तु और गहराई हो। केवल आकर्षक चित्रांकन या प्रस्तुति किसी कृति को महान नहीं बनाती। कृति की वास्तविक महत्ता उसके ज्ञान, सिद्धांत और विषय की गंभीरता से होती है।

उन्होंने कहा कि जिन सिद्धांतों को जिन-दर्शन ने प्रतिपादित किया है, उन्हें साहित्य के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाना आवश्यक है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी संस्कृति, दर्शन और गौरवशाली परंपरा से परिचित हो सकें। कार्यक्रम का मंच संचालन सतेंद्र जैन साहूला ने किया। संगोष्ठी में राष्ट्रीय स्तर के जैन विद्वान डा. श्रेयांस कुमार जैन, डा. अनेकान्त जैन, डा. सुरेन्द्र जैन भारती, डा. वीरसागर जैन, डा. अशोक जैन, प्रतिष्ठाचार्य विनोद जी जैन रजवांस, प्रो. अभिषेक जैन दमोह, सुनील जैन संचय, आशीष जैन शास्त्री, डा. नीलम जैन, डा. पंकज जैन, महावीर पण्डित, विकर्ष शास्त्री, मनोज जैन बाकलीवाल सहित अनेक स्थानीय विद्वान एवं सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित रहे।

इस अवसर पर श्रुत मंथन वर्षायोग समिति के मनोज जैन, प्रवीण जैन पद्मावती, विवेक जैन, चक्रेश जैन, राजीव जैन, शैलेश जैन (लालाजी), जगदीश प्रसाद जैन, अनन्त जैन, आनंद जैन, आशु जैन (वी.के.), अनिकेत जैन, आशीष जैन (बाबा), सतेंद्र जैन (सोनू), राजू भाई (चचे), अमित जैन, गौरव जैन, पंडित विजय जैन शास्त्री, मीडिया प्रभारी राहुल जैन समेत समस्त मंडल एवं सकल जैन समाज के लोग मौजूद रहे।

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