सहारनपुर में मस्जिद विध्वंस पर जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने उठाए गंभीर सवाल

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तहकीकात TODAY 

रिपोर्ट – फरहान खान/ अजेंद्र चौहान 

नई दिल्ली। सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित करीब एक सदी पुरानी मस्जिद के विध्वंस को लेकर जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने गहरी चिंता जताई है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए इसे न्याय के मूल सिद्धांतों और न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता के विपरीत बताया। मौलाना मदनी ने कहा कि जब विवादित भूमि कलेक्ट्रेट परिसर से संबंधित थी और प्रशासन इस मामले में प्रत्यक्ष रूप से एक पक्ष था, तो प्रशासनिक स्तर पर एकतरफा निर्णय लेकर कार्रवाई किया जाना न्याय के बुनियादी सिद्धांतों पर सवाल खड़े करता है। उन्होंने कहा कि कानून का सामान्य सिद्धांत है कि कोई भी पक्ष अपने ही मामले में निर्णायक की भूमिका नहीं निभा सकता। उन्होंने दावा किया कि 4 सितंबर को निचली अदालत का फैसला आया था, लेकिन उसमें मस्जिद को तत्काल ध्वस्त करने का कोई स्पष्ट आदेश नहीं था। इसके बावजूद प्रभावित पक्ष को कानूनी उपाय अपनाने का पर्याप्त अवसर दिए बिना और फैसले की प्रमाणित प्रति उपलब्ध होने से पहले ही कुछ घंटों के भीतर रात में मस्जिद को बुलडोजर से ढहा दिया गया। मौलाना मदनी ने कहा कि निचली अदालत का फैसला न्यायिक प्रक्रिया का अंतिम चरण नहीं होता और संबंधित पक्ष को उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय का रुख करने का संवैधानिक अधिकार है। उन्होंने कहा कि जिस कार्रवाई से क्षति की भरपाई संभव न हो, उसमें संबंधित पक्ष को कानूनी उपाय अपनाने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना न्याय का बुनियादी तकाजा है। जमीयत अध्यक्ष ने मस्जिद कमेटी और कानूनी विशेषज्ञों से अपील की कि वे प्रशासन की कार्रवाई के खिलाफ बिना देरी किए उच्च न्यायालय का रुख करें, ताकि मामले की न्यायिक समीक्षा हो सके और प्रशासन पर लगाए जा रहे शक्ति के कथित दुरुपयोग के आरोपों की जांच सुनिश्चित हो। मौलाना मदनी ने देश के न्यायप्रिय और अमन-पसंद नागरिकों से भी लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक तरीके से आवाज उठाने की अपील की। उन्होंने कहा कि धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में किसी भी तरह का मनमाना या पक्षपातपूर्ण रवैया सामाजिक सौहार्द के लिए नुकसानदायक हो सकता है। उन्होंने कहा कि सांप्रदायिकता और धार्मिक विद्वेष के खिलाफ आवाज उठाना तथा संविधान और कानून के शासन की रक्षा करना हर न्यायप्रिय नागरिक की साझा जिम्मेदारी है। जमीयत ने उम्मीद जताई कि न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से मामले का समाधान निकलेगा और लोगों का कानून के शासन में विश्वास कायम रहेगा।

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