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स्टोरी
कहते हैं कि रिश्ते टूटते एक पल में हैं, लेकिन उन्हें जोड़ने में पूरी जिंदगी लग जाती है। यह कहानी भी एक ऐसे ही रिश्ते की है, जो गुस्से में टूट गया था, लेकिन प्यार और अपनापन उसे फिर से जोड़ लाया। शिखा और सौरभ ने छह साल पहले बड़े अरमानों के साथ शादी की थी। सपनों से सजा उनका संसार धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था, लेकिन जिंदगी हमेशा एक जैसी नहीं रहती। छोटी-छोटी नोकझोंक कब बड़े विवाद में बदल गई, इसका एहसास दोनों को भी नहीं हुआ। बात इतनी बढ़ गई कि एक दिन शिखा ने फैसला कर लिया कि अब वह सौरभ के साथ नहीं रह सकती। गुस्से और नाराज़गी के उस दौर में तलाक़ की प्रक्रिया शुरू हुई और आखिरकार दोनों कानूनी रूप से अलग हो गए। जिस घर में कभी हंसी गूंजती थी, वहां अब सन्नाटा था। शिखा अपने मायके लौट आई और दोनों ने मान लिया कि उनकी कहानी अब खत्म हो चुकी है।
लेकिन शायद किस्मत को कुछ और मंजूर था।
बेटी का घर टूटने का दर्द शिखा के पिता सहन नहीं कर पाए। वह अंदर ही अंदर टूट गए। एक दिन अचानक उन्हें हार्ट अटैक आ गया। परिवार में हड़कंप मच गया। आनन-फानन में उन्हें सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टर इलाज कर रहे थे, लेकिन हालत में कोई खास सुधार नहीं हो रहा था। परिवार की चिंता हर गुजरते दिन के साथ बढ़ती जा रही थी। उधर, जब यह खबर सौरभ तक पहुंची तो उसने एक पल भी नहीं सोचा कि अब वह उस परिवार का हिस्सा नहीं है। उसने सिर्फ इतना सोचा कि अस्पताल के बिस्तर पर वह व्यक्ति है जिसने कभी उसे बेटे की तरह अपनाया था। सौरभ तुरंत अस्पताल पहुंचा। उसने अपने पूर्व ससुर को सरकारी अस्पताल से दिल्ली के मेदांता अस्पताल ले जाने का फैसला किया। इलाज का पूरा इंतजाम किया और हर कदम पर उनके साथ खड़ा रहा। कई दिनों तक चले उपचार के बाद आखिरकार शिखा के पिता की तबीयत में सुधार होने लगा और धीरे-धीरे वे पूरी तरह स्वस्थ हो गए। यह सब देखकर शिखा के दिल में दबे हुए एहसास फिर से जागने लगे। उसे एहसास हुआ कि रिश्ते सिर्फ कागज़ों से नहीं टूटते और न ही अदालत की मुहर प्यार को खत्म कर सकती है। फिर वह दिन आया, जब दोनों को कोर्ट में पेश होना था। अदालत के बाहर शिखा और सौरभ आमने-सामने खड़े थे। कुछ पल दोनों चुप रहे। आंखों में कई सवाल थे, कई यादें थीं और अनगिनत भावनाएं थीं। अचानक शिखा ने अपने हाथों में पकड़े कागज़ों को देखा। वही कागज़ जिन्होंने दो जिंदगियों को अलग कर दिया था। अगले ही पल उसने उन कागज़ों को फाड़कर फेंक दिया। इसके बाद वह खुद को रोक नहीं सकी। वह दौड़कर सौरभ के गले लग गई और फूट-फूटकर रोने लगी। सौरभ की आंखें भी नम थीं। कोर्ट परिसर में मौजूद लोगों ने उस पल को देखा, जब नाराज़गी हार गई और प्यार जीत गया। यह सिर्फ एक पति-पत्नी की कहानी नहीं है, बल्कि उन सभी रिश्तों के लिए एक संदेश है जो कभी गुस्से, अहंकार या गलतफहमी की वजह से टूटने की कगार पर पहुंच जाते हैं। क्योंकि कई बार जिंदगी हमें दूसरा मौका देती है… और जो लोग उस मौके को पहचान लेते हैं, उनकी अधूरी कहानी फिर से पूरी हो जाती है। तलाक़ के कागज़ फट गए, लेकिन प्यार का रिश्ता फिर से जुड़ गया।





